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‘दुनिया का सबसे अमीर बच्चा’ जिसका बेस्ट फ्रेंड था सिर्फ एक कुत्ता, पूरा ईरान उसे बुला रहा?

तेहरान.

एक हाथ में रईसी थी, दूसरे में तन्हाई… और साथी था सिर्फ एक कुत्ता। 1970 के दशक की उस वायरल खबर का नायक आज ईरान की सड़कों पर गूंज रहे नारों का केंद्र बन गया है। आज ईरान की सड़कें एक बार फिर आग उगल रही हैं। दिसंबर 2025 के आखिर से शुरू हुए ये विरोध प्रदर्शन अब एक राष्ट्रीय क्रांति में बदलते प्रतीत हो रहे हैं।

आर्थिक संकट, महंगाई, रियाल की रिकॉर्ड गिरावट और इस्लामिक रिपब्लिक की दमनकारी नीतियों से तंग आकर लोग सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन इस बार सबसे ज्यादा गूंज रहा है एक नाम- रजा पहलवी का। वे ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे और ईरान के 'क्राउन प्रिंस' हैं। तो सवाल ये है कि वो शख्स, जिसे बचपन में दुनिया का सबसे अमीर बच्चा कहा जाता था और जिसका सबसे करीबी दोस्त सिर्फ एक कुत्ता था, वह आज 47 साल के निर्वासन के बाद भी ईरान के दिलों में क्यों जिंदा है?

वह पुरानी तस्वीर और 'सोने का पिंजरा'

31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में जन्मे रजा पहलवी को जन्म से ही क्राउन प्रिंस का दर्जा मिला। उनके पिता मोहम्मद रजा शाह उस वक्त ईरान के शक्तिशाली शासक थे- तेल की कमाई से देश अमीर हो रहा था और शाह का निजी साम्राज्य अरबों डॉलर का था। रजा को फ्रेंच गवर्नेस ने पाला, निजी पैलेस स्कूल में पढ़ाई हुई, बॉडीगार्ड्स 24/7 साथ रहते थे। लेकिन ये वैभव अकेलेपन के साथ आया। हाल ही सोशल मीडिया पर ईरान की एक पत्रिका की कटिंग वायरल हो रही है। यह 1978 के आसपास की है। उस समय रजा पहलवी की उम्र महज 17 साल थी। हेडलाइन में लिखा है- दुनिया का सबसे अमीर बच्चा, जिसका दोस्त सिर्फ उसका कुत्ता है। उस दौर में रजा पहलवी के पास वह सब कुछ था जो एक इंसान सपने में भी नहीं सोच सकता। अपना हवाई जहाज, कस्टम मेड कारें, महलों में सुरक्षा गार्ड और बेहिसाब दौलत। लेकिन उस रिपोर्ट के मुताबिक, उनके पास जो नहीं था, वह था- 'सच्चा दोस्त'। उनका सबसे करीबी साथी उनका स्पैनियल कुत्ता 'जूडी' था। यह उस दौर की बात है जब ईरान को मिडिल-ईस्ट का पेरिस कहा जाता था और रजा पहलवी उसके भविष्य के बादशाह थे।

1979 की क्रांति और सब कुछ खो जाना

इस तस्वीर के छपने के कुछ ही समय बाद, रजा पहलवी की किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि किसी फिल्मी कहानी को भी मात दे दी। 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई। उनके पिता, शाह मोहम्मद रजा पहलवी को देश छोड़ना पड़ा। वह लड़का, जो 'दुनिया का सबसे अमीर बच्चा' था, अचानक 'दुनिया का सबसे हाई-प्रोफाइल रिफ्यूजी' बन गया। महलों की जगह निर्वासन ने ले ली। जिस देश पर उन्हें राज करना था, वहां उनके परिवार के लिए मौत के फरमान जारी हो गए। रजा पहलवी ने अपनी जवानी अमेरिका में एक निर्वासित राजकुमार के रूप में बिताई, अपने देश को दूर से जलते हुए देखते रहे।

आज पूरा ईरान उन्हें क्यों बुला रहा है?

कहानी का सबसे अहम मोड़ अब, यानी 2023-2025 के बीच आया है। आज ईरान की सड़कों पर, हिजाब विरोधी प्रदर्शनों में और सरकार विरोधी रैलियों में एक नारा अक्सर गूंजता है- रजा शाह, रूहता शाद (रजा शाह, तुम्हारी आत्मा को शांति मिले) और ए शहजादे, वापस आओ।

ईरान में प्रदर्शन दिसंबर 2025 में तेहरान के ग्रैंड बाजार से शुरू हुए, जहां व्यापारियों ने महंगाई के खिलाफ हड़ताल की। जल्द ही ये पूरे देश में फैल गए- तेहरान, शिराज, इस्फहान, मशहद, यहां तक कि छोटे शहरों में। सरकार ने इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद कर दीं, लेकिन लोग नहीं रुके। मौतें सैकड़ों में हैं, हजारों गिरफ्तारियां हुई हैं, लेकिन नारे अब सिर्फ आर्थिक नहीं- पूरी तरह ब्रांडाजन के हैं।

और इसी बीच रजा पहलवी ने वीडियो मैसेज जारी किए:

6 जनवरी को पहली बार उन्होंने लोगों से शाम 8 बजे एक साथ नारे लगाने को कहा। 8-9 जनवरी को फिर फ्रेश कॉल दिया- शहर के सेंटर कब्जाने, पुराना शेर और सूरज झंडा लहराने और शहरों पर कब्जा करने की अपील। उन्होंने कहा- मैं जल्द ही अपनी मातृभूमि में वापस आऊंगा। प्रदर्शनकारियों ने उनकी कॉल पर अमल किया- लाखों सड़कों पर उतरे, और नारे सिर्फ मौत बर खामनेई नहीं, बल्कि पहलवी वापस आएगा भी लगे।

इसके पीछे के प्रमुख कारण:

  • आर्थिक बदहाली: ईरान की करेंसी (रियाल) रसातल में जा चुकी है। महंगाई चरम पर है। लोगों को वह दौर याद आ रहा है जब शाह के राज में ईरान की इकोनॉमी मजबूत थी और तेल का पैसा विकास में लग रहा था।
  • धार्मिक कट्टरता से उब चुकी जनता: महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुए आंदोलनों ने यह साफ कर दिया है कि ईरान की नई पीढ़ी (Gen Z) इस्लामी गणतंत्र के सख्त नियमों (जैसे अनिवार्य हिजाब) को नहीं मानती। वे उस सेक्युलर और आधुनिक ईरान की कल्पना करते हैं, जिसका प्रतिनिधित्व पहलवी परिवार करता था।
  • नेतृत्व का अभाव: ईरान में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ है। ऐसे में रजा पहलवी, जो अब 63 वर्ष के हैं, एक जाने-पहचाने चेहरे और 'एकता के प्रतीक' के रूप में उभरे हैं। वे लोगों के लिए उस 'खोए हुए सुनहरे दौर' की निशानी हैं।

लेकिन क्या सब चाहते हैं राजशाही?

नहीं। कुछ विरोधी कहते हैं कि शाह के दौर में भी दमन था (SAVAK की बदनामी), असमानता बढ़ी थी। कुछ नारे लगाते हैं: न शाह, न मुल्ला। ईरानी सेना और शासन ने प्रदर्शनों को अमेरिका और इजराइल की साजिश करार दिया है। लेकिन आज की तस्वीर में पहलवी सबसे मजबूत और सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त चेहरा हैं। दिलचस्प बात यह है कि रजा पहलवी खुद को अब 'राजा' के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करते। हालिया इंटरव्यूज और भाषणों में उन्होंने साफ किया है कि वे राजशाही वापस लाने के लिए नहीं, बल्कि ईरान में लोकतंत्र लाने के लिए लड़ रहे हैं। वे कहते हैं- मुझे सत्ता नहीं चाहिए, मैं बस अपने लोगों को चुनने का अधिकार देना चाहता हूं। यह बदलाव उन्हें उस 17 साल के रईस बच्चे से एक परिपक्व राजनेता बनाता है।

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