विदेशी चंदा विधेयक पर टकराव, लोकसभा में सरकार-विपक्ष के बीच जोरदार हंगामा

नई दिल्ली
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए) का कांग्रेस, समाजवादी पार्टी एवं वामदलों ने विरोध किया।
विपक्ष का कहना है कि एफसीआरए ईसाइयों, अल्पसंख्यकों और एनजीओ के खिलाफ है। जो एनजीओ भारत के लोगों के लिए अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें इस कानून के जरिए दंडित किया जा रहा है।
सरकार पर गुमराह करने का लगाया आरोप
विपक्षी दलों के भारी विरोध के चलते यह बिल लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका। संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय सुरक्षा है।
फिलहाल विधेयक टल गया है, लेकिन विवाद बरकरार है। स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि विपक्षी सांसद जिस विधेयक की बात कर रहे हैं, जब वह आएगा, तब विरोध कर सकते हैं।
आमने-सामने सरकार और विपक्ष
विदेशी चंदे से संबंधित विधेयक पर केंद्र सरकार और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। लोकसभा में बुधवार को भारी हंगामे और विरोध के कारण सरकार को फिलहाल इस विधेयक को पेश करने से पीछे हटना पड़ा।
सरकार इसे पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे एनजीओ और नागरिक समाज पर सख्त नियंत्रण की कोशिश बता रहा है।
सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वाम दलों के सांसदों ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (एफसीआरए) का जोरदार विरोध शुरू कर दिया। कई सांसद नारेबाजी करते हुए वेल में पहुंच गए।
इसके पहले संसद परिसर में भी विपक्ष ने बैनर लेकर प्रदर्शन किया। हंगामे के चलते कार्यवाही पांच मिनट में ही स्थगित करनी पड़ी।
हंगामे के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि विधेयक सूची में होने के बावजूद उसे चर्चा के लिए नहीं लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह विधेयक किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। इसका उद्देश्य राष्ट्र हित की रक्षा और विदेशी फंड का दुरुपयोग रोकना है। यदि विदेशी धन का उपयोग विरोध प्रदर्शनों, गलत सूचना या अवैध गतिविधियों में होता है तो उसे नियंत्रित करना जरूरी है।
सरकार ने यह भी कहा कि यह किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है।विवाद का सबसे बड़ा कारण विधेयक का वह प्रविधान है, जिसमें एफसीआरए का पंजीकरण खत्म होने पर एनजीओ की विदेशी फंडिंग से बनी संपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण के नियंत्रण में चली जाएंगी। यह स्थिति रद्द, नवीनीकरण न होने या सरेंडर के हालात में भी लागू होगी।
कांग्रेस के मनीष तिवारी ने इसे अंसवैधानिक बताया और कहा कि इस कानून से एनजीओ की संपत्तियों पर सरकार का कब्जा हो जाएगा। सरकार इन संपत्तियों को अपने विभागों को सौंप सकती है या बेच सकती है। विपक्ष का कहना है कि विधेयक में कई अन्य बड़े बदलाव भी प्रस्तावित हैं।
विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्था अब उस धन को दूसरी संस्था को ट्रांसफर नहीं कर सकेगी। प्रशासनिक खर्च की सीमा 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दी गई है। सभी पदाधिकारियों के लिए आधार अनिवार्य होगा।
विदेशी चंदा लेने के लिए सिर्फ एसबीआई की नई दिल्ली शाखा में खाता खोलना होगा। लोकसभा में सांसद डिंपल यादव एवं राज्यसभा में पार्टी नेता रामगोपाल यादव ने कहा कि इससे छोटे और जमीनी स्तर के संगठन प्रभावित होंगे।
फंड ट्रांसफर पर रोक से ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे प्रोजेक्ट ठप पड़ सकते हैं। प्रशासनिक खर्च की सीमा घटने से संस्थाएं योग्य कर्मचारियों को नहीं रख पाएंगी। लोक सेवकों को विदेशी फंड लेने पर पूर्ण प्रतिबंध और लोक सेवक की परिभाषा भी विवाद का कारण बनी है।
विपक्ष का आरोप है कि इससे शोधकर्ता और सलाहकार भी प्रभावित हो सकते हैं। केरल में चुनावी माहौल के बीच यह मुद्दा और गरमा गया है, जहां विपक्ष ने इसे चर्च और सामाजिक संस्थाओं को निशाना बनाने की भाजपा की कोशिश बताया है।




