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20 का सामान मंगाने के लिए 200 का ऑर्डर! डिलीवरी फी के झमेले में क्या गंवा रहे भारतीय?

 नई दिल्ली
    
आज के दौर में हमारे सामने क्विक कॉमर्स के नाम की एक बेहद आधुनिक सुविधा मौजूद है जो हमें अजनबी नहीं लगती. यह कई मायनों में सुविधा से बढ़कर एक बुनियादी जरूरत बन चुकी है और ऐसा लगता है कि यह हमेशा से थी. यहां एक टैप, वहां एक स्वाइप और कुछ ही मिनटों में कोई आपके दरवाजे पर ठीक वही चीज लेकर आ जाता है जिसके बारे में आपने कुछ मिनट पहले सोचा था और जिसके बारे में आपको पता भी नहीं था कि आपको उसकी वाकई जरूरत थी भी या नहीं। 

Blinkit और Instamart पर ठहर गई जिंदगी
महीनों से शायद उससे भी ज्यादा समय से मैंने चुपचाप Blinkit और Instamart जैसे ऐप्स के इर्द-गिर्द अपनी एक दिनचर्या बना ली थी. यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. मैं न तो बहुत ज्यादा ऑर्डर करती थी और न ही बेतहाशा पैसे उड़ाती थी. असल में मेरे साथ बिल्कुल उल्टा था. छोटी-छोटी खरीदारी. दूध का एक पैकेट. कुछ मिर्चें. ब्रेड. कभी-कभी मन किया तो आइसक्रीम जैसी चीजें ही खरीदती थीं. लेकिन इसमें हमेशा एक पेंच होता था और वो है ऑर्डर की न्यूनतम कीमत। 

ज्यादातर दिनों में मुझे सिर्फ 60 या 70 रुपये की चीजों की जरूरत होती थी. लेकिन क्योंकि मैं डिलीवरी फीस नहीं देना चाहती थी इसलिए मैं अपने कार्ट की कीमत बढ़ाकर 200 रुपये तक कर देती था. यहां एक चॉकलेट डाल दी, वहां कोई स्नैक या शायद किसी ऐसी चीज का एक और पैकेट जिसकी मुझे तुरंत जरूरत नहीं थी. उस पल में यह नुकसानदायक नहीं लगता था. आखिर यह सिर्फ 100 रुपये या उसके आस-पास की ही तो बात थी. लेकिन ऐसा नहीं था. यह हर रोज होता था। 

और इसी तरह खर्च धीरे-धीरे बढ़ता गया. बड़े, साफ-साफ दिखने वाले हिस्सों में नहीं बल्कि उन चुपचाप, छोटे-छोटे तरीकों से जिन्हें ऐप धीरे से बढ़ावा देता था. बिहेवियरल इकोनॉमिस्ट्स के पास इसके लिए एक शब्द है और वो है फ्रिक्शनलेस स्पेंडिंग. जब पेमेंट करना इतना आसान हो जाता है कि आप उस पर ध्यान देना ही बंद कर देते हैं। 

इसलिए मैंने रुकने का फैसला किया. न Blinkit. न Instamart. न किसी डिटॉक्स के लिए, न किसी चैलेंज के लिए, बस यह देखने के लिए कि क्या होगा। 

जिस बात ने मुझे हैरान किया, वह सिर्फ यह नहीं थी कि मैंने कितने पैसे बचाए. बल्कि वो सब कुछ था जो मुझे वापस मिला। 

वो खर्च, जिसका हमें अहसास तक नहीं होता…'
इस अनुभव के दौरान जो पहली बात मैंने गहराई से महसूस की वो थी कि जब आपके पास मिनिमम कार्ट वैल्यू का कोई दबाव नहीं होता है तो आप सिर्फ वही खरीदते हैं जिसकी आपको जरूरत होती है। 

पड़ोस की किराने की दुकान पर एक छोटा सा चक्कर लगाने का मतलब था 100 रुपये खर्च करना, ठीक उसी चीज पर जो मेरे दिमाग में थी. न ज्यादा, न कम. कोई फालतू चीजें नहीं, कोई 'चलो यह भी ले लेते हैं' वाली सोच नहीं. इसके उलट डिलीवरी ऐप्स पर हर बार 100-150 रुपये का जो अतिरिक्त सामान हम फ्री डिलीवरी या मिनिमम वैल्यू के चक्कर में जोड़ देते हैं, वो महीने के अंत में एक हैरान कर देने वाला बड़ा अमाउंट बन जाता है. यह वो पैसा है जिसके खर्च होने का हमें अहसास तक नहीं होता है। 

ऐसा नहीं था कि ऐप्स अपने आप में महंगे थे. बात तो उस तरीके की थी जिससे उन्होंने चुपचाप मेरे खर्च करने के तरीके को बदल दिया था.

'वो मूवमेंट, जिसे मिस करने का हमें अहसास तक नहीं होता…'
दूसरा बदलाव शारीरिक था जो लगभग तुरंत महसूस हुआ. 

जब सब कुछ सीधे आपके दरवाजे पर आने लगता है तो आप अनजाने में ही बाहर निकलना बंद कर देते हैं. यह जानबूझकर किया गया आलस नहीं है बल्कि इसलिए है क्योंकि बाहर जाने की जरूरत ही खत्म हो जाती है. उस एक महीने में मैंने पाया कि मैं पहले से कहीं ज्यादा चल-फिर रही हूं. गली के मोड़ तक की वो छोटी-छोटी ट्रिप्स. कभी सब्जीवाले के पास तो कभी डेयरी की दुकान तक. हालांकि इसे वर्कआउट की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता लेकिन यह मेरे शरीर को यह याद दिलाने के लिए काफी था कि जिम की चारदीवारी के बाहर भी दुनिया है जिसमें फिजकली एक्टिव और मूवमेंट जैसी चीजें हो सकती हैं। 

अपनी सब्जियां खुद चुनने, अपने बैग खुद उठाने और उन छोटी-छोटी आम सी ट्रिप्स पर जाने में कुछ अजीब सा सुकून है जिन्हें हम कभी हल्के में लेते थे। 

वो क्रेविंग्स जिन पर आप सवाल नहीं उठाते
फिर देर रात के ऑर्डर्स की बात आती है. क्विक कॉमर्स के इस दौर से पहले रात 2 बजे वाली आइसक्रीम या मिठाई की तलब यानी क्रेविंग्स अक्सर दो रास्तों पर जाकर खत्म होती थीं. या तो आप उसे नजरअंदाज कर देते थे या फिर अगले दिन का इंतजार करते थे. अक्सर अगली सुबह तक आप उस चीज को भूल भी चुके होते थे. लेकिन अब हर ख्वाहिश बस एक टैप की दूरी पर है. समस्या यह है कि जब कोई चीज इतनी आसानी से उपलब्ध हो जाती है तो आप खुद से मोलभाव करना बंद कर देते हैं। 

मैं अब अपनी तलब के आगे झुक नहीं रही थीं
मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ इसलिए ऑर्डर नहीं कर रही थी क्योंकि मुझे किसी चीज की जरूरत थी. मैं इसलिए ऑर्डर कर रही थी क्योंकि मैं कर सकती थी. वह रुकावट, वो छोटा सा ठहराव जो कभी आपको दो बार सोचने पर मजबूर करता था, अब खत्म हो चुका था। 

इन ऐप्स को अपने फोन से हटाने का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि वो ठहराव मेरी जिंदगी में वापस आ गया. अक्सर खुद को रोकने के लिए बस वो ही काफी होता है।  

वो आदतें जिनके खोने का आपको पता भी नहीं चला
कहीं न कहीं मैंने लिस्ट बनाना भी बंद कर दिया था. जब आप कभी भी ऑर्डर कर सकते हैं तो प्लान बनाने की क्या जरूरत? लेकिन इन ऐप्स से पीछे हटने का मतलब था. अपनी पुरानी और शांत व्यवस्थाओं की ओर लौटना. मैंने फिर से अपनी जरूरतों की लिस्ट बनानी शुरू की. खाने का प्लान बनाना, भले ही मोटे तौर पर ही सही. ऐसी सब्जियां खरीदना जो अक्सर ऐप पर मिलने वाली सब्जियों से ज्यादा ताजी और कभी-कभी सस्ती भी होती थीं। 

वो लिस्ट जो मैंने इन 4 हफ्तों के दौरान बनाईं
 इससे मुझे मोलभाव करने का वो छोटा सा गिल्टी प्लेजर भी मिला. यह एक विशुद्ध भारतीय आदत है जो दुनिया के हर एल्गोरिदम से परे है.अब मैं हर हफ्ते मंडी जाने लगी हूं और ताजी सब्जियों का जो स्वाद और संतोष मुझे वहां मिलता है, वो मोबाइल स्क्रीन पर कभी मुमकिन नहीं था। 

सुविधा की कीमत
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि क्विक कॉमर्स बुरा है. यह असल समस्याओं को हल करता है. यह समय बचाता है. यह ऐसी आसानी देता है कि एक बार जब आपको इसकी आदत पड़ जाती है तो यह लगभग जरूरी लगने लगता है. लेकिन ज्यादातर चीजों की तरह जो बहुत आसानी से मिल जाती हैं, यह भी चुपके से बिना किसी शोर-शराबे के कुछ न कुछ छीन लेती है। 

थोड़ा पैसा, थोड़ी चहलकदमी, थोड़ा संयम और कुछ रोजमर्रा के मेल-जोल
जब मैंने वो ऐप्स डिलीट किए तो जिंदगी में रातों-रात कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया. लेकिन हां जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा सचेत और व्यवस्थित हो गई और अगर आप मुझसे पूछें कि मैंने कितने पैसे बचाए?

तो सच कहूं तो मैं शायद रोजाना 100 से 150 रुपये ज्यादा खर्च कर रही थी. सिर्फ मिनिमम ऑर्डर वैल्यू पूरी करने और डिलीवरी चार्ज से बचने के लिए और मैं यह लगभग रोज ही करती थी. उस पल में यह ज्यादा नहीं लगता था. कभी लगता भी नहीं है। 

लेकिन एक महीने में यह रकम 4,000 से 5,500 रुपये के बीच हो जाती है. मुझे यह भी एहसास हुआ कि दो लोगों के लिए पूरे महीने का राशन, सब्जियां और फल भी इतने महंगे नहीं पड़ते जो पैसे मैं डिलीवरी चार्ज से बचने में खर्च कर रहा थी. ये पैसे पूरी तरह से फालतू जा रहे थे। 

ताजे फल हैं सबसे बढ़िया (तियासा भोवाल)
यह कोई जिंदगी बदलने वाली बात नहीं है. इन बचे पैसों से आप किसी वेकेशन पर नहीं जा पाएंगे. लेकिन यह कोई छोटी-मोटी बात भी नहीं है और जब आप इस बचत के साथ उन अच्छे बदलावों को भी देखते हैं, आप अपनी खान-पान की बेहतर होती आदतों को देखते हैं, और उन भूली-बिसरी छोटी-छोटी दिनचर्याओं की वापसी को महसूस करते हैं तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. तब आपको अहसास होता है कि 10 मिनट की सुविधा के बदले आपने जो खोया था, उसे कहीं ज्यादा बड़े और बेहतर रूप में आपने वापस पा लिया है। 

क्या मैं फिर से उन ऐप्स पर वापस गई?
मेरा मकसद कभी भी इन ऐप्स को बुरा साबित करना नहीं था. आखिर में ये ऐप्स हमारी जिंदगी में जो सहूलियत लाते हैं, उसकी कोई बराबरी नहीं है. इस एक महीने में मुझे यह एहसास हुआ कि ऑर्डर तभी करें जब यह बिल्कुल जरूरी हो, सिर्फ मन की मौज में आकर नहीं. आपको एक संतुलन बनाना होगा और इसकी चाबी सिर्फ आपके ही पास है। 

और आपके सवाल का जवाब कि क्या मैंने वे ऐप्स फिर से इंस्टॉल किए? हां. क्योंकि जैसा कि मैंने कहा, उनके होने से जिंदगी सचमुच आसान हो जाती है. लेकिन मुझे यह भी एहसास हुआ है कि मुझे उनका इस्तेमाल बहुत ज्यादा सोच-समझकर करना होगा। 

यह एक अच्छा प्रयोग था यह देखने के लिए कि क्या मैं उनके बिना एक महीना गुजार सकती हूं और मैंने ऐसा कर दिखाया. कहते हैं कि कोई भी आदत बनने में 21 दिन लगते हैं और सच कहूं तो वापस उन ऐप्स पर लौटना थोड़ा अजीब लग रहा है. क्योंकि कई मायनों में मैंने उस दौर का सच में मजा लिया था। 

 

 

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